मूल श्लोक – 3
अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप |
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि || 3 ||
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| अश्रद्दधाना: | श्रद्धा रहित, विश्वासहीन |
| पुरुषा: | मनुष्य |
| धर्मस्य | इस धर्म के, इस आध्यात्मिक मार्ग के |
| अस्य | इस (भक्ति-योग के) |
| परन्तप | हे अर्जुन! (शत्रुओं को दमन करने वाले) |
| अप्राप्य | प्राप्त किए बिना |
| माम् | मुझे, परमेश्वर को |
| निवर्तन्ते | लौट आते हैं |
| मृत्युसंसारवर्त्मनि | जन्म-मृत्यु के संसार रूपी मार्ग में |
हे शत्रु विजेता! वे लोग जो इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते वे मुझे प्राप्त नहीं कर सकते। वे जन्म-मृत्यु के मार्ग पर चलते हुए बार-बार इस संसार में लौटकर आते रहते हैं।

विस्तृत भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण श्रद्धा के महत्व को अत्यंत स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं।
अध्याय 9 में जहाँ एक ओर राजविद्या और राजगुह्य का दिव्य ज्ञान दिया जा रहा है,
वहीं दूसरी ओर यह भी बताया जा रहा है कि यह ज्ञान किन्हें फल नहीं देता।
“अश्रद्दधाना: पुरुषा:” —
जो व्यक्ति इस मार्ग में श्रद्धा नहीं रखते,
जो ईश्वर, आत्मा या भक्ति को संदेह की दृष्टि से देखते हैं,
वे इस दिव्य ज्ञान का लाभ नहीं उठा पाते।
ऐसे लोग —
- ईश्वर को सिद्ध नहीं मानते
- भक्ति को कल्पना समझते हैं
- आत्मज्ञान को अव्यावहारिक मानते हैं
फलस्वरूप “अप्राप्य मां” —
वे भगवान को प्राप्त किए बिना ही रह जाते हैं।
और परिणामस्वरूप —
“मृत्युसंसारवर्त्मनि निवर्तन्ते”
वे पुनः उसी जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख, कर्म-बंधन के चक्र में घूमते रहते हैं।
दार्शनिक दृष्टिकोण
यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि —
श्रद्धा के बिना ज्ञान मोक्षदायी नहीं बन सकता।
यहाँ श्रद्धा का अर्थ अंधविश्वास नहीं,
बल्कि सत्य को जानने की विनम्र तत्परता है।
जब मनुष्य कहता है —
“मैं पहले ही सब जानता हूँ”
या
“ईश्वर जैसी कोई सत्ता नहीं”
तो वह स्वयं ही अपने द्वार बंद कर लेता है।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक कर्म, ज्ञान और भक्ति के संगम की बात करता है —
जहाँ श्रद्धा वह भूमि है
जिस पर आत्मज्ञान का बीज अंकुरित होता है।
प्रतीकात्मक अर्थ
| श्लोकांश | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| अश्रद्दधाना: पुरुषा: | अहंकार और संशय से ग्रस्त मानव |
| धर्मस्यास्य | भक्ति-योग और आत्मज्ञान का मार्ग |
| अप्राप्य मां | ईश्वर-अनुभूति से वंचित रह जाना |
| मृत्युसंसारवर्त्मनि | अंतहीन जन्म-मृत्यु और कर्मबंधन का चक्र |
आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा
- श्रद्धा के बिना कोई भी साधना फलदायी नहीं होती
- ईश्वर-ज्ञान को नकारने वाला व्यक्ति स्वयं अपने विकास को रोक लेता है
- केवल बौद्धिक तर्क से मोक्ष संभव नहीं
- संदेह आत्मा को बाँधता है, श्रद्धा मुक्त करती है
- भक्ति और विश्वास के बिना जीवन यांत्रिक चक्र बन जाता है
आत्मचिंतन के प्रश्न
- क्या मैं आध्यात्मिक मार्ग को खुले मन से स्वीकार करता हूँ?
- क्या मेरा संदेह मुझे आगे बढ़ने से रोक रहा है?
- क्या मैं केवल तर्क करता हूँ, या अनुभव की ओर भी बढ़ता हूँ?
- क्या मेरी श्रद्धा स्थिर है या परिस्थितियों पर निर्भर है?
- क्या मैं जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर निकलने का प्रयास कर रहा हूँ?
निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से स्पष्ट संदेश देते हैं कि —
श्रद्धा के बिना भक्ति-योग का मार्ग निष्फल हो जाता है।
जो व्यक्ति इस दिव्य ज्ञान पर विश्वास नहीं करता,
वह उसी संसार के चक्र में घूमता रहता है
जिससे मुक्त होने के लिए यह ज्ञान दिया गया है।
अतः साधक को चाहिए कि वह —
- अहंकार छोड़े
- संशय से ऊपर उठे
- श्रद्धा, भक्ति और अनुभव को अपनाए
क्योंकि श्रद्धा ही वह सेतु है
जो मनुष्य को
संसार से ईश्वर तक
और बंधन से मोक्ष तक ले जाती है। 🌸
