Bhagavad Gita: Hindi, Chapter 9, Sloke 17

मूल श्लोक: 17

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह: |
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ||

शब्दार्थ

  • पिताः — पिता, उत्पत्ति करने वाले
  • अहम् — मैं
  • अस्म्य जगतो — इस जगत का
  • माता — माता, पोषण करने वाली
  • धाता — पालनकर्ता, संरक्षक
  • पितामहः — दादा, या संहारकर्ता, समय का प्रतीक
  • वेद्यं — ज्ञेय, जिसे जाना जाना चाहिए
  • पवित्रम् — पवित्र, शुद्ध
  • ओङ्कार — ‘ॐ’, ब्रह्म का प्रतीक
  • ऋक्साम् — ऋग्वेद
  • यजुर् — यजुर्वेद
  • एव च — और भी

मैं ही इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय और पितामह हूँ। मैं ही शुद्धिकर्ता, ज्ञान का लक्ष्य और पवित्र मंत्र ओम् हूँ, मैं ही ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ।

विस्तृत भावार्थ

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में सर्वव्यापक ईश्वरत्व का दर्शन कराते हैं।
वे कहते हैं कि —

  1. पिता (उत्पत्ति) — सभी जीवों की उत्पत्ति उनकी इच्छा और शक्ति से होती है।
  2. माता (पालन) — सभी जीवों का पालन, संरक्षण और पोषण उनका कार्य है।
  3. धाता (संरक्षक) — जीवन को स्थिर रखने वाला भी वही है।
  4. पितामह (संहारकर्ता) — समय और मृत्यु के रूप में संहार करने वाला भी वही है।

इसके अतिरिक्त, भगवान स्वयं वेदों और ‘ॐ’ में व्याप्त हैं।
इसका अर्थ है कि ईश्वर केवल बाह्य रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, पूजा और मंत्रों में भी सर्वत्र विद्यमान हैं।

भावात्मक व्याख्या और गहराई से विश्लेषण

दार्शनिक दृष्टिकोण

यह श्लोक सर्वव्यापक ब्रह्म और ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन कराता है।

  • ईश्वर सृष्टि के स्रष्टा, पालक और संहारकर्ता हैं।
  • वे केवल व्यक्ति या देवता रूप में नहीं, बल्कि साक्ष्य, मंत्र, वेद और ध्वनि में भी व्याप्त हैं।
  • ‘ॐ’ और वेद केवल श्लोक या शब्द नहीं,
    बल्कि ईश्वर के तत्त्व का प्रतीक हैं।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक यह बताता है कि —

ईश्वर केवल देखने या समझने योग्य नहीं है,
बल्कि वे संपूर्ण सृष्टि और ज्ञान का आधार हैं।

प्रतीकात्मक अर्थ

श्लोकांशप्रतीकात्मक अर्थ
पिताहमस्म्य जगतोसृष्टि का आधार और उत्पत्ति करने वाला
मातापोषण और संरक्षण करने वाला
धाताजीवन को स्थिर करने वाला, पालनकर्ता
पितामहःसमय और संहार का प्रतीक
वेद्यम्, पवित्रम्, ॐज्ञान, मंत्र और शुद्ध चेतना में व्याप्त ईश्वर
ऋक्, साम, यजुर्वेदईश्वर के विभिन्न अभिव्यक्त रूप

आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा

  • ईश्वर सर्वव्यापक है — सृष्टि, ज्ञान और पूजा में
  • उनका ज्ञान केवल बाह्य आडंबर से नहीं,
    बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति से प्राप्त होता है
  • जीवन में ‘ॐ’ और वेदों के अर्थ को समझना
    साधक को ईश्वर के निकट लाता है
  • सृष्टि का पालन और समय का संहार दोनों ईश्वर की योजना में हैं
  • जो व्यक्ति यह समझ लेता है, वह जीवन को साक्षीभाव से जीता है

आत्मचिंतन के प्रश्न

  • क्या मैं ईश्वर की सर्वव्यापकता को समझ रहा हूँ?
  • क्या मैं केवल बाह्य रूप में पूजा करता हूँ या तत्त्व में भी अनुभव करता हूँ?
  • क्या मैं सृष्टि और समय की व्यवस्था को ईश्वर का कार्य मानकर स्वीकार करता हूँ?
  • क्या मैं वेद, मंत्र और ज्ञान का आदर करता हूँ, क्योंकि वही ईश्वर के रूप हैं?

निष्कर्ष

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह बताते हैं कि —

ईश्वर ही सृष्टि का पिता, माता, पालक और संहारकर्ता है।
वे केवल मानव रूप या देवता रूप में नहीं,
बल्कि ज्ञान, मंत्र, वेद और ‘ॐ’ में भी व्याप्त हैं।

जो व्यक्ति इस व्यापक दृष्टि से ईश्वर को जानता है,
वह न केवल जीवन में स्थिर होता है, बल्कि मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।

अतः साधक को चाहिए कि वह —

  • ईश्वर की सर्वव्यापकता को अनुभव करे
  • तत्त्व और रूप दोनों में भक्ति रखे
  • और सृष्टि के नियमानुसार जीवन जीते हुए
    परम सत्य का ध्यान करे 🌸

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