मूल श्लोक: 21
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं |
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति |
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना |
गतागतं कामकामा लभन्ते ||
शब्दार्थ
- ते — वे लोग, जो
- तम् — उसे (भगवान या उपास्य ईश्वर)
- भुक्त्वा — भोग करके, भक्ति या कर्म करते हुए
- स्वर्गलोकम् — स्वर्ग का लोक
- विशालम् — विस्तृत, महान
- क्षीणे पुण्ये — पुण्य समाप्त होने पर, जब कर्म का फल समाप्त हो
- मर्त्यलोकम् — मानव लोक, संसार
- विशन्ति — प्रवेश करते हैं, लौट आते हैं
- एवं — इस प्रकार
- त्रयीधर्म — वेदों में वर्णित तीन प्रकार के धर्म (धार्मिक कर्तव्य, यज्ञ और तप)
- अनुप्रपन्ना — अनुसरण करने वाले
- गतागतम् — प्राप्त और फिर जाने योग्य
- कामकामा — इच्छाओं के अनुसार
- लभन्ते — पाते हैं, भोगते हैं
जब वे स्वर्ग के सुखों को भोग लेते हैं और उनके पुण्य कर्मों के फल क्षीण हो जाते हैं तब फिर वे पृथ्वीलोक पर लौट आते हैं। इस प्रकार वे जो अपने इच्छित पदार्थ प्राप्त करने हेतु वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करते हैं, बार-बार इस संसार में आवागमन करते रहते हैं।

विस्तृत भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कर्म, पुण्य और पुनर्जन्म के चक्र को स्पष्ट करते हैं।
- जो साधक धर्म, यज्ञ और तप का पालन करता है, वह पुण्य अर्जित करता है।
- पुण्य के बल पर उसे स्वर्गलोक प्राप्त होता है, जहाँ उसे भोग और सुख की प्राप्ति होती है।
- लेकिन पुण्य समाप्त होने पर — यानी उसका कर्मफल समाप्त होने पर —
वह पुनः मानव लोक में जन्म लेता है। - इस प्रकार, इच्छाओं और कर्मों के अनुसार साधक या भुक्ता पुनः जन्म लेता है, जब तक कि वह सत्य, भक्ति और ईश्वर-साक्षात्कार में स्थिर नहीं हो जाता।
श्लोक यह भी इंगित करता है कि केवल कर्मफल की इच्छा से किए गए यज्ञ और तप व्यक्ति को अंतिम मोक्ष तक नहीं ले जाते।
भावात्मक व्याख्या और गहराई से विश्लेषण
दार्शनिक दृष्टिकोण
यह श्लोक संसार और कर्मफल की अस्थायित्व को दर्शाता है।
- स्वर्ग और पुण्य केवल क्षणिक भोग हैं।
- मृत्युपरांत भी इच्छाएँ और कर्मों का चक्र जारी रहता है।
- यह हमें चेतावनी देता है कि केवल फल की इच्छा से किया गया धर्म स्थायी मुक्ति नहीं देता।
- स्थायी मोक्ष के लिए आवश्यक है — असक्त भक्ति, ज्ञान और तत्त्वबोध।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक यह बताता है कि —
संसार में सुख और दुःख अस्थायी हैं,
और स्थायी सुख केवल ईश्वर-साक्षात्कार और मोक्ष से प्राप्त होता है।
प्रतीकात्मक अर्थ
| श्लोकांश | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| स्वर्गलोकं विशालं | पुण्य और भोग की अस्थायी प्राप्तियाँ |
| क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं | पुण्य समाप्ति के बाद पुनर्जन्म का चक्र |
| त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना | धर्म, यज्ञ और तप का अनुकरण करने वाले |
| गतागतं कामकामा | इच्छाओं के अनुसार यात्रा करने वाले जीव |
आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा
- पुण्य भोग का अंत अस्थायी है
- केवल कर्मफल के पीछे भागना संसार में बँधन बढ़ाता है
- स्थायी मुक्ति के लिए ज्ञान, भक्ति और असक्ति जरूरी है
- यह श्लोक हमें सही साधना की ओर प्रेरित करता है, जो मोक्ष की प्राप्ति कराती है
आत्मचिंतन के प्रश्न
- क्या मैं केवल कर्मफल के लिए कर्म करता हूँ?
- क्या मेरे भोग और सुख स्थायी हैं या अस्थायी?
- क्या मैं मोक्ष और ईश्वर-साक्षात्कार की ओर अग्रसर हूँ?
- क्या मैं अपने जीवन को केवल इच्छाओं और पुण्य कर्मों के चक्र में फँसा हुआ पाता हूँ?
निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह स्पष्ट करते हैं कि —
पुण्य और स्वर्ग लोक केवल अस्थायी भोग हैं,
और केवल धर्म, यज्ञ या तप का पालन स्थायी मुक्ति नहीं देता।
जो व्यक्ति ईश्वर-साक्षात्कार और असक्ति के मार्ग पर चलता है,
वह इस जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर सच्चा आनंद और मोक्ष प्राप्त करता है।
अतः साधक को चाहिए कि वह —
- केवल कर्मफल की इच्छा न रखे
- भक्ति, ज्ञान और असक्ति का मार्ग अपनाए
- और स्थायी मोक्ष की प्राप्ति के लिए जीवन को समर्पित करे 🌸
