मूल श्लोक: 28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥
शब्दार्थ
- तत्त्ववित् — तत्व (परम सत्य) को जानने वाला, ज्ञानी
- तु — वास्तव में
- महाबाहो — हे महाबाहु (अर्जुन)!
- गुणकर्मविभागयोः — प्रकृति के गुणों और उनके अनुसार होने वाले कर्मों के भेद में
- गुणाः — प्रकृति के त्रिगुण (सत्त्व, रजस्, तमस्)
- गुणेषु — अन्य गुणों में
- वर्तन्ते — कार्य करते हैं, गतिशील रहते हैं
- इति — ऐसा
- मत्वा — समझकर
- न सज्जते — आसक्त नहीं होता
हे महाबाहु अर्जुन! तत्त्वज्ञानी आत्मा को गुणों और कर्मों से भिन्न रूप में पहचानते हैं वे समझते हैं कि ‘इन्द्रिय, मन, आदि के रूप में केवल गुण ही हैं जो इन्द्रिय विषयों, (गुणेषु) में संचालित होते हैं। इसलिए वे उनमें नहीं फंसते।

विस्तृत भावार्थ
यह श्लोक अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान को प्रकट करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो तत्वदर्शी है — वह जानता है कि शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सब प्रकृति के त्रिगुणों से बने हैं और वे त्रिगुण ही एक-दूसरे में क्रिया कर रहे हैं।
साधारण व्यक्ति यह मानता है कि “मैं कर रहा हूँ”, “मेरा यह कर्म है”, “मुझे इसका फल चाहिए” — लेकिन तत्वज्ञानी समझता है कि यह सब प्रकृति के गुणों का परस्पर खेल है, और आत्मा केवल साक्षी है।
इसलिए वह कर्म करता हुआ भी आसक्ति से मुक्त रहता है।
भावात्मक व्याख्या और गहराई से विश्लेषण
दार्शनिक दृष्टिकोण
- प्रकृति त्रिगुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) से युक्त है और शरीर व मन इन्हीं से निर्मित हैं।
- आत्मा, जो शुद्ध चेतन है, इनसे अछूती है।
- तत्ववित् समझता है कि आत्मा कभी कर्ता नहीं थी — जो कुछ हो रहा है, वह गुणों का गुणों में ही संचालन है।
- यह समझ आने पर व्यक्ति कर्म करता हुआ भी उसमें लिप्त नहीं होता, और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।
प्रतीकात्मक अर्थ
- गुणाः — सत्त्व (ज्ञान), रजस् (क्रिया), तमस् (जड़ता)
- गुणेषु वर्तन्ते — मन, इंद्रियाँ, बुद्धि — सभी इन गुणों के अधीन ही क्रियाशील हैं
- तत्त्ववित् — वह जो आत्मा और प्रकृति का भेद जानता है
- न सज्जते — वह किसी भी कर्म में “मैं” और “मेरा” की भावना से नहीं जुड़ता
आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा
- आत्मा को कर्ता समझना मोह है।
- ज्ञानी जानता है कि कर्म का मूल कारण प्रकृति के गुण हैं।
- यह समझ आने से व्यक्ति अहंकार और कर्मफल की आसक्ति से बच जाता है।
- कर्म में प्रवृत्त रहते हुए भी वह बंधन से मुक्त रहता है — यही कर्मयोग है।
आत्मचिंतन के प्रश्न
क्या मैं यह समझता हूँ कि कर्मों का संचालन प्रकृति के गुण करते हैं?
क्या मैं हर कर्म को “मैं” से जोड़कर आसक्ति बढ़ा रहा हूँ?
क्या मैं आत्मा और प्रकृति के भेद को जानने का प्रयास कर रहा हूँ?
क्या मैं कर्म में लिप्त होते हुए भी स्वयं को साक्षी मान पाता हूँ?
निष्कर्ष
इस श्लोक में श्रीकृष्ण एक अत्यंत महत्वपूर्ण योग-दर्शन की झलक देते हैं — कर्मों की गति को जानकर भी उसमें न फँसने की कला।
तत्त्ववित् — अर्थात तत्व को जानने वाला — जानता है कि:
- कर्म प्रकृति से उत्पन्न हैं
- आत्मा अकर्ता है
- अहंकारजन्य आसक्ति ही बंधन का कारण है
जो व्यक्ति यह दृष्टि प्राप्त कर लेता है, वह संसार में रहकर भी मुक्त रहता है।
यह योग की परिपक्व अवस्था है — जहाँ कर्म होते हैं, परंतु करने वाला “मैं” नहीं होता।
यही ज्ञानयुक्त कर्मयोगी की पहचान है — और यही मोक्ष की ओर कदम है।
