Bhagavad Gita: Hindi, Chapter 8, Sloke 11

मूल श्लोक – 11

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥

शब्दार्थ

संस्कृत शब्दहिन्दी अर्थ
यत् अक्षरम्जो अक्षर (अविनाशी तत्त्व), परब्रह्म
वेदविदःवेदों को जानने वाले, शास्त्रज्ञ ज्ञानीजन
वदन्तिकहते हैं
यत् यतयःजो साधक, तपस्वी
विशन्तिउसमें प्रवेश करते हैं, प्राप्त करते हैं
वीतरागाःराग-द्वेष से रहित, आसक्ति रहित
यत् इच्छन्तःजिसकी प्राप्ति की इच्छा करते हैं
ब्रह्मचर्यम्ब्रह्म में स्थित रहने वाला जीवन, संयमित जीवन
चरन्तिआचरण करते हैं, पालन करते हैं
तत् ते पदम्वह परम पद मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ
संग्रहेणसंक्षेप में
प्रवक्ष्येमैं बताऊँगा

वेदों के ज्ञाता उसका वर्णन अविनाशी के रूप में करते हैं। महान तपस्वी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं और उसमें स्थित होने के लिए सांसारिक सुखों का त्याग करते हैं। मैं तुम्हें इस मुक्ति के मार्ग के संबंध में संक्षेप में बताऊंगा।

विस्तृत भावार्थ

यह श्लोक भगवद्गीता में उस “अक्षर ब्रह्म” की ओर संकेत करता है — जो अविनाशी, सनातन, परम और निर्गुण-निराकार है।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह उस परमपद का संक्षिप्त वर्णन करने जा रहे हैं जिसे:

  1. वेदज्ञानी (वेदविदः) जानते हैं — जिनकी वाणी में वेदों की गूढ़ व्याख्या है।
  2. यतयः (तपस्वी) उस अक्षर ब्रह्म में प्रवेश करते हैं — अर्थात समाधिस्थ होकर ब्रह्म के साथ एक हो जाते हैं।
  3. वीतरागाः — जिनका मन राग-द्वेष, मोह, लालच, और आसक्ति से मुक्त है — वही उस तत्त्व में प्रवेश करने में समर्थ होते हैं।
  4. ब्रह्मचर्यं चरन्ति — जीवनभर ब्रह्मचर्य, संयम, तप और ध्यान के पथ पर चलने वाले उसी परमपद की प्राप्ति की कामना से ऐसा करते हैं।

इस श्लोक में “ब्रह्मचर्य” का तात्पर्य केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि चित्त की शुद्धता, आध्यात्मिक जीवनशैली, और परम लक्ष्य के लिए समर्पण है।

दार्शनिक दृष्टिकोण

यह श्लोक ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्ति योग का समन्वय करते हुए उस परम सत्य की दिशा दिखाता है:

  • अक्षरम् — जिसे न कोई उत्पत्ति है न विनाश। यह ब्रह्म की निराकार, निरगुण, शुद्ध चेतना है।
  • यह “परम पद” केवल ग्रंथों से जानने योग्य नहीं, बल्कि अनुभव से प्राप्त होता है।
  • इसके लिए रागरहित जीवन, ब्रह्मचर्य पालन, और अंतःकरण की शुद्धि आवश्यक है।
  • “विशन्ति” शब्द इस बात की पुष्टि करता है कि आत्मा परमात्मा में पूर्ण विलीन हो जाती है — द्वैत का अंत और अद्वैत की अनुभूति।

प्रतीकात्मक अर्थ

श्लोकांशप्रतीकात्मक अर्थ
यदक्षरं वेदविदः वदन्तिज्ञानियों द्वारा परिभाषित अविनाशी ब्रह्म
यतयो वीतरागा: विशन्तितपस्वी, आसक्ति रहित साधक जो उसमें एकत्व प्राप्त करते हैं
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्तिसंयम, तपस्या, और आत्मशुद्धि द्वारा उसे पाने की इच्छा
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्येवह परम लक्ष्य जिसे भगवान स्वयं प्रकट करने वाले हैं

आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा

  • यह श्लोक बताता है कि मोक्ष या परमपद केवल कर्म से नहीं, बल्कि जीवनशैली, संयम और चेतना की परिपक्वता से मिलता है।
  • केवल शास्त्र पढ़ना पर्याप्त नहीं, ब्रह्मचर्य का आचरण, राग-द्वेष से मुक्ति, और अंतर्मुखी साधना परम आवश्यक हैं।
  • संयमित जीवन ही वह साधन है जिससे चेतना ब्रह्म में प्रवेश कर सकती है।

आत्मचिंतन के प्रश्न

  1. क्या मैं उस अविनाशी सत्य की खोज में जीवन को समर्पित कर रहा हूँ?
  2. क्या मेरा मन राग-द्वेष से मुक्त है?
  3. क्या मेरी साधना केवल शाब्दिक है या वास्तव में ब्रह्मचर्यपूर्ण जीवन शैली में ढली हुई है?
  4. क्या मैं उस सत्य को जानने की लालसा से तपस्वी मार्ग पर चल रहा हूँ?
  5. क्या मेरे जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक सफलता है, या उससे परे भी कुछ है?

निष्कर्ष

यह श्लोक उस परम लक्ष्य की प्रस्तावना है जिसे पाने के लिए वेद, संयम, त्याग और तप की आवश्यकता होती है।
भगवान श्रीकृष्ण उस अक्षर ब्रह्म — परमपद — का परिचय देने जा रहे हैं, जिसे:

  • वेद कहते हैं,
  • वीतराग तपस्वी प्राप्त करते हैं,
  • और जिसे पाने के लिए ब्रह्मचर्य का जीवन अपनाया जाता है।

यह श्लोक आत्मा की उस यात्रा की नींव है, जहाँ अंततः वह परमात्मा में एक हो जाती है।

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