Bhagavad Gita: Hindi, Chapter 9, Sloke 07

मूल श्लोक – 7

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् |
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || 7 ||

शब्दार्थ

संस्कृत शब्दहिन्दी अर्थ
सर्वभूतानिसमस्त प्राणी
कौन्तेयहे कुंतीपुत्र अर्जुन
प्रकृतिम्प्रकृति में
यान्तिचले जाते हैं, लीन हो जाते हैं
मामिकाम्मेरी (मेरे अधीन)
कल्पक्षयेकल्प के अंत में
पुनःफिर
तानिउन्हें
कल्पादौकल्प के आरंभ में
विसृजामिपुनः सृजन करता हूँ
अहम्मैं

हे कुन्ती पुत्र! कल्प के अन्त में सभी प्राणी मेरी प्राकृत शक्ति में विलीन हो जाते हैं और अगली सृष्टि के प्रारंभ में, मैं उन्हें पुनः प्रकट कर देता हूँ।

विस्तृत भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि के चक्रात्मक स्वरूप को स्पष्ट करते हैं।
यहाँ सृष्टि, स्थिति और प्रलय — तीनों का रहस्य एक ही श्लोक में समाहित है।

कल्पक्षये” —
जब एक कल्प (ब्रह्मा का एक दिन) समाप्त होता है,
तब समस्त जीव अपनी-अपनी स्थूल पहचान खोकर
ईश्वर की प्रकृति में लीन हो जाते हैं।

परंतु यह नाश नहीं है —
यह केवल अव्यक्त अवस्था है।

फिर “कल्पादौ” —
नए कल्प के आरंभ में
भगवान उन्हीं जीवों को
उनके संचित कर्मों के अनुसार
पुनः प्रकट करते हैं।

दार्शनिक दृष्टिकोण

यह श्लोक कर्म-सिद्धांत और पुनर्जन्म के गहन सत्य को दर्शाता है।

  • आत्मा नष्ट नहीं होती
  • केवल शरीर और प्रकट अवस्था का लय होता है
  • कर्म संस्कार के रूप में बने रहते हैं

ईश्वर यहाँ स्रष्टा नहीं, संचालक के रूप में प्रकट होते हैं —
जो प्रकृति के माध्यम से सृष्टि का विस्तार करते हैं।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि —

सृष्टि रेखीय नहीं,
बल्कि चक्रीय है।

प्रतीकात्मक अर्थ

श्लोकांशप्रतीकात्मक अर्थ
सर्वभूतानिसभी जीवात्माएँ
प्रकृतिं यान्तिअव्यक्त अवस्था में लीन होना
मामिकाम्ईश्वर के अधीन प्रकृति
कल्पक्षयेजीवन/संसार के एक चक्र का अंत
कल्पादौनए आरंभ का संकेत
विसृजाम्यहम्चेतना द्वारा पुनः अभिव्यक्ति

आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा

  • मृत्यु अंत नहीं, परिवर्तन है
  • प्रत्येक कर्म का प्रभाव अगली सृष्टि तक जाता है
  • ईश्वर करुणामय है — वह फिर अवसर देता है
  • जीवन एक चक्र है, न कि एक बार की घटना
  • मोक्ष इस चक्र से बाहर निकलने का मार्ग है

आत्मचिंतन के प्रश्न

  • क्या मैं मृत्यु को अंत मानता हूँ या परिवर्तन?
  • क्या मैं अपने कर्मों के प्रति सजग हूँ?
  • क्या मैं इस चक्र से मुक्त होने का प्रयास कर रहा हूँ?
  • क्या मैं ईश्वर की व्यवस्था पर विश्वास करता हूँ?
  • क्या मैं जीवन को एक सतत यात्रा के रूप में देख पाता हूँ?

निष्कर्ष

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह बताते हैं कि —

सृष्टि न तो आकस्मिक है,
न ही अंतिम।

यह एक दिव्य व्यवस्था है
जहाँ प्रत्येक जीव को
अपने कर्मों के अनुसार
पुनः अवसर दिया जाता है।

परंतु जो साधक इस चक्र को समझ लेता है,
वह कर्मबंधन से ऊपर उठकर
मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

अतः मनुष्य को चाहिए कि वह —

  • कर्म करे, पर बंधन न बनाए
  • जीवन को चक्र के रूप में समझे
  • और ईश्वर की शरण में जाकर
    इस अनंत आवर्तन से मुक्त हो जाए

क्योंकि ईश्वर वही है
जो अंत में भी आधार है
और आरंभ में भी स्रष्टा।
🌸

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *