मूल श्लोक: 28
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै: |
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ||
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| शुभ-अशुभ फलैः | अच्छे और बुरे परिणामों से |
| एवं | इस प्रकार |
| मोक्ष्यसे | मुक्त होगा, बंधनों से छुटकारा पाएगा |
| कर्मबन्धनैः | कर्मों के परिणाम और बंधनों से |
| संन्यासयोगयुक्तात्मा | संन्यास (त्याग) और योग (कर्म योग) से युक्त आत्मा |
| विमुक्तः | मुक्त, स्वतंत्र |
| माम् | परमात्मा |
| उपैष्यसि | प्राप्त करेगा, पहुँच जाएगा |
इस प्रकार सभी कार्य मुझे समर्पित करते हुए तुम शुभ और अशुभ फलों के बंधन से मुक्त रहोगे। इस वैराग्य द्वारा मन को मुझ में अनुरक्त कर तुम मुक्त होकर मेरे पास आ पाओगे।

विस्तृत भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण संन्यास (त्याग) और कर्मयोग (कर्म का योग) का समन्वय बताते हैं।
- कर्मबन्धन से मुक्ति —
अच्छे या बुरे कर्मों के परिणाम (शुभ-अशुभ फल) आत्मा को बांधते हैं। - संन्यासयोगयुक्तात्मा —
केवल कर्म का त्याग करना (संन्यास) पर्याप्त नहीं, और केवल कर्म करना भी पर्याप्त नहीं।
कर्म योग का अर्थ है — कर्म करते हुए भी मन को ईश्वर में लीन रखना। - विमुक्ति और ईश्वर की प्राप्ति —
जो आत्मा संन्यास और योग दोनों से युक्त रहती है,
वह कर्मों के बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा की प्राप्ति करती है।
श्रीकृष्ण यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि मोक्ष और परमात्मा प्राप्ति के लिए कर्म और त्याग का संतुलन आवश्यक है।
भावात्मक व्याख्या और गहराई से विश्लेषण
दार्शनिक दृष्टिकोण
- कर्म का त्याग केवल शारीरिक या बाहरी क्रियाओं का त्याग नहीं है।
- कर्मयोग में कर्म करते समय मन को ईश्वर में स्थिर रखना मुख्य है।
- यही योग और संन्यास का संयोजन आत्मा को बंधनों और पुण्य-पाप से मुक्त करता है।
- यह श्लोक भक्ति, ज्ञान और कर्म का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।
प्रतीकात्मक अर्थ
| श्लोकांश | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| शुभ-अशुभ फल | कर्मों का परिणाम, चाहे अच्छा हो या बुरा |
| कर्मबन्धन | कर्मों के कारण बंधन और मोह |
| संन्यासयोगयुक्तात्मा | त्याग और ईश्वर-संयम के साथ कर्मयोग |
| विमुक्तः | कर्म और भौतिक बंधनों से मुक्त आत्मा |
| मामुपैष्यसि | परमात्मा की प्राप्ति |
आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा
- कर्म का त्याग (संन्यास) और कर्म का पालन (योग) **एक साथ होना चाहिए।
- केवल निष्क्रिय संन्यास या केवल कर्म करना — दोनों अपर्याप्त हैं।
- मोक्ष का मार्ग कर्म योग और भक्ति का समन्वय है।
- आत्मा की स्थिरता और ईश्वर में लीनता कर्म के बंधनों को तोड़ देती है।
आत्मचिंतन के प्रश्न
- क्या मैं अपने कर्मों में मन, वचन और कर्म से ईश्वर-संयम ला रहा हूँ?
- क्या मेरा संन्यास केवल बाहरी त्याग है, या आंतरिक समर्पण भी है?
- क्या मैं कर्मफल के मोह से मुक्त होकर कर्म करता हूँ?
- क्या मैं समझता हूँ कि मोक्ष कर्म और भक्ति का समन्वय है?
- क्या मेरा जीवन ईश्वर-समर्पित कर्मयोग का आदर्श पालन कर रहा है?
निष्कर्ष
यह श्लोक मोक्ष का मार्गदर्शन करता है।
जो आत्मा संन्यास और कर्मयोग से युक्त रहती है,
वह शुभ और अशुभ कर्मों के बंधनों से मुक्त होकर ईश्वर की प्राप्ति करती है।
मुख्य संदेश:
- कर्म का त्याग और कर्म का पालन — दोनों आवश्यक हैं।
- मोक्ष केवल कर्म या केवल त्याग से नहीं, बल्कि संतुलित संन्यासयोग से आता है।
- ईश्वर प्राप्ति का मार्ग हमेशा भक्ति, योग और समर्पण के साथ कर्म में है।
