मूल श्लोक – 16
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| आ-ब्रह्म-भुवनात् | ब्रह्मलोक तक के सभी लोकों से लेकर |
| लोकाः | लोक (जगत, संसार) |
| पुनरावर्तिनः | पुनः लौटने वाले, बार-बार जन्म लेने वाले |
| अर्जुन | हे अर्जुन! |
| माम् उपेत्य | मुझे प्राप्त होकर, मेरे समीप पहुँचकर |
| तु | परंतु, किन्तु |
| कौन्तेय | हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)! |
| पुनर्जन्म | फिर से जन्म |
| न विद्यते | नहीं होता, अस्तित्व नहीं है |
हे अर्जुन! इस भौतिक सृष्टि के सभी लोकों में ब्रह्मा के उच्च लोक तक जाकर भी तुम्हें पुनर्जन्म प्राप्त होगा। हे कुन्ती पुत्र! परन्तु मेरा धाम प्राप्त करने पर फिर आगे पुनर्जन्म नहीं होता।

विस्तृत भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण संसार के संपूर्ण लोकों की अस्थिरता और सीमाओं को स्पष्ट करते हैं।
“आब्रह्मभुवनाल्लोका:” — अर्थात सृष्टि के उच्चतम लोक, जैसे ब्रह्मलोक, स्वर्गलोक, इन्द्रलोक आदि भी इस नियम से मुक्त नहीं हैं।
यहाँ तक कि ब्रह्मा जी का लोक भी नश्वर है। वहाँ निवास करने वाले भी अपने पुण्य कर्मों के समाप्त होने पर पुनः संसार के चक्र में लौट आते हैं।
“पुनरावर्तिनः” का अर्थ है — पुनः लौटने वाले।
अर्थात कोई भी लोक स्थायी निवास नहीं है; प्रत्येक आत्मा कर्मफल के अनुसार ऊपर-नीचे होती रहती है।
परंतु जो आत्मा “मामुपेत्य” — अर्थात् ईश्वर को प्राप्त कर लेती है, वह जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाती है।
भगवान का यह वचन केवल एक सांत्वना नहीं, बल्कि आत्मज्ञान और भक्ति की पराकाष्ठा है — कि ईश्वर-प्राप्ति ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।
यहाँ श्रीकृष्ण संसार के वैभव, स्वर्ग की मोहकता, और ब्रह्मलोक की महिमा को भी सीमित बताते हैं — क्योंकि यह सब काल के अधीन है।
ईश्वर ही एकमात्र ऐसा सत्य है जो अविनाशी, शाश्वत और अकाल है।
दार्शनिक दृष्टिकोण
यह श्लोक कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष के सिद्धांत का सार है।
संसार के सभी लोक — चाहे वे स्थूल हों या सूक्ष्म — कर्म के प्रभाव से उत्पन्न हैं और इसलिए क्षणभंगुर हैं।
कर्म का परिणाम समाप्त होते ही आत्मा को पुनः देह धारण करनी पड़ती है।
परंतु जब आत्मा अपने सच्चे स्वरूप को जान लेती है — कि वह न शरीर है, न मन, बल्कि स्वयं ब्रह्म का अंश है —
तब वह ईश्वर में लीन होकर “मामुपेत्य” की अवस्था को प्राप्त करती है, जहाँ पुनर्जन्म का कोई प्रश्न नहीं रहता।
यह वही अवस्था है जिसे उपनिषदों में कहा गया —
“यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।”
प्रतीकात्मक अर्थ
| श्लोकांश | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| आब्रह्मभुवनाल्लोका: | सभी लोक, जो कर्म और माया से बंधे हैं |
| पुनरावर्तिनः | जन्म-मृत्यु के निरंतर चक्र में घूमना |
| मामुपेत्य | ईश्वर का साक्षात्कार या ब्रह्म-प्राप्ति |
| पुनर्जन्म न विद्यते | आत्मा का चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करना |
आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा
- यह श्लोक हमें यह बोध कराता है कि स्वर्गलोक भी अंतिम गंतव्य नहीं, वह भी अस्थायी है।
- केवल ईश्वर-प्राप्ति ही स्थायी शांति और आनंद प्रदान करती है।
- मनुष्य को चाहिए कि वह केवल पुण्य या स्वर्ग की कामना न करे, बल्कि ईश्वर से एकत्व की साधना करे।
- कर्मकांड, भोग, और यश की सीमा होती है — परंतु भक्ति और आत्मज्ञान की कोई सीमा नहीं।
- यह जीवन अवसर है — पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होने का, भगवान से मिलने का।
आत्मचिंतन के प्रश्न
- क्या मैं स्वर्ग और भोग की इच्छा में लिप्त हूँ या ईश्वर की प्राप्ति का इच्छुक हूँ?
- क्या मैं यह समझता हूँ कि ब्रह्मलोक तक भी नश्वरता है?
- क्या मेरा जीवन मोक्ष की दिशा में अग्रसर है या कर्मों के चक्र में उलझा हुआ है?
- क्या मैं “मामुपेत्य” — ईश्वर-प्राप्ति — के लिए साधना कर रहा हूँ?
- क्या मैं इस क्षणभंगुर संसार में स्थायी सुख खोजने का प्रयास तो नहीं कर रहा?
निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह सिखाते हैं कि —
संसार का कोई भी लोक, चाहे वह ब्रह्मलोक ही क्यों न हो, स्थायी नहीं है।
हर स्थान, हर स्थिति कर्म और समय के अधीन है।
परंतु जो आत्मा भगवान को प्राप्त कर लेती है, वह इन सब बंधनों से मुक्त होकर परम गति, मोक्ष, या शाश्वत आनन्द को प्राप्त करती है।
अतः साधक को चाहिए कि वह केवल स्वर्ग या कर्मफल की इच्छा न रखे, बल्कि अपने जीवन का लक्ष्य ईश्वर-साक्षात्कार बनाए।
“मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते” — यही मोक्ष का अमर वचन है।
जो भगवान को पा लेता है, उसके लिए पुनर्जन्म नहीं — केवल शांति, ज्ञान और अनन्त आनंद रह जाता है।

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