मूल श्लोक – 13
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| ओम् इति | ‘ओम्’ शब्द रूप में |
| एकाक्षरम् | एक अक्षर वाला (ओंकार) |
| ब्रह्म | परम सत्य, परमात्मा |
| व्याहरन् | उच्चारण करते हुए |
| माम् | मुझे, भगवान श्रीकृष्ण को |
| अनुस्मरन् | स्मरण करते हुए |
| य: | जो व्यक्ति |
| प्रयाति | प्रस्थान करता है, प्राण त्यागता है |
| त्यजन् देहम् | शरीर का त्याग करते हुए |
| स: | वह व्यक्ति |
| याति | प्राप्त करता है |
| परमाम् गतिम् | परम गति, मोक्ष या ईश्वर प्राप्ति |
जो देह त्यागते समय मेरा स्मरण करता है और पवित्र अक्षर ओम् का उच्चारण करता है वह परम गति को प्राप्त करता है।

विस्तृत भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण “ओम्” के महात्म्य को समझाते हैं।
“ओम्” केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का मूल बीज है — यह स्वयं ब्रह्म का प्रतीक है।
जब साधक अपने जीवन के अंतिम क्षणों में “ओम्” का जप करता है और उसके साथ भगवान का स्मरण रखता है, तब उसकी चेतना लौकिक सीमाओं को पार कर दिव्यता से एकाकार हो जाती है।
‘ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म’ — यह दर्शाता है कि ओम् स्वयं ब्रह्म का प्रतीक है,
और ‘मामनुस्मरन्’ — यह बताता है कि ओम् का जप करते हुए ईश्वर का स्मरण आवश्यक है।
इस प्रकार केवल यांत्रिक जप नहीं, बल्कि भावपूर्ण स्मरण ही साधक को मोक्ष की ओर ले जाता है।
‘त्यजन्देहं’ का अर्थ है — जब कोई व्यक्ति शरीर का त्याग करता है, तब यदि उसका मन पूर्ण रूप से ईश्वर में लीन है, तो वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है।
अतः भगवान यहाँ यह सिखाते हैं कि मृत्यु का क्षण तभी दिव्य हो सकता है जब जीवनभर की साधना, भक्ति, और स्मरण की आदतें गहरी हों।
दार्शनिक दृष्टिकोण
यह श्लोक अद्वैत दर्शन और भक्ति योग दोनों को एक सूत्र में जोड़ता है।
“ओम्” का जप ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप को प्रकट करता है — जहाँ आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं।
जब साधक इस एकत्व का अनुभव करते हुए भगवान का स्मरण करता है, तो वह देहाभिमान से मुक्त होकर ब्रह्मभाव को प्राप्त करता है।
यहाँ मृत्यु केवल शरीर का अंत नहीं, बल्कि आत्मा की परम यात्रा की शुरुआत है।
यह श्लोक सिखाता है कि जीवन का लक्ष्य केवल मृत्यु के भय से मुक्ति नहीं, बल्कि उस दिव्यता की प्राप्ति है जो “परम गति” कहलाती है।
प्रतीकात्मक अर्थ
| श्लोकांश | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म | ओम् ब्रह्म का प्रतीक है — सृष्टि, पालन और संहार तीनों शक्तियों का संगम |
| व्याहरन् | जप या उच्चारण करते हुए साधक की चेतना ब्रह्म में लीन होती है |
| मामनुस्मरन् | ईश्वर का निरंतर स्मरण साधक को चित्तशुद्धि प्रदान करता है |
| य: प्रयाति त्यजन्देहम् | जो देह त्यागते समय प्रभु का स्मरण करता है, उसका अंत दिव्य होता है |
| स याति परमां गतिम् | वह परम गति, अर्थात मोक्ष या ईश्वर-एकत्व की अवस्था को प्राप्त होता है |
आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा
- मृत्यु के क्षण में ओम् का जप केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि जीवनभर के अभ्यास का परिणाम है।
- जो व्यक्ति निरंतर ईश्वर का स्मरण करता है, उसका चित्त मृत्यु के समय स्वतः भगवद्भाव में लीन होता है।
- यह श्लोक बताता है कि मोक्ष केवल विद्या या कर्म से नहीं, बल्कि “स्मरण” से संभव है — जब मन, वाणी, और आत्मा एकसाथ भगवान में स्थिर हों।
- साधक को जीवनभर ओम् का जप, ध्यान, और ईश्वर का स्मरण करते रहना चाहिए ताकि मृत्यु का क्षण साधना की परिपूर्णता बन जाए।
- “ओम्” का नियमित जप मन को स्थिर करता है, चित्त को पवित्र बनाता है, और मृत्यु के भय को मिटा देता है।
आत्मचिंतन के प्रश्न
- क्या मैं प्रतिदिन ओम् का जप या ईश्वर का स्मरण करता हूँ?
- मेरा मन मृत्यु या भय के समय किसका स्मरण करेगा — ईश्वर का या संसार का?
- क्या मेरा जीवन ऐसे कर्मों और भावों से भरा है जो परम गति के योग्य हैं?
- क्या मैं ओम् के गूढ़ अर्थ — ब्रह्म, आत्मा और विश्व के एकत्व — को समझने का प्रयास कर रहा हूँ?
- क्या मैं अपने जीवन को इतना ईश्वरमय बना रहा हूँ कि मृत्यु केवल एक परिवर्तन बने, अंत नहीं?
निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से यह दिव्य सत्य प्रकट करते हैं कि —
“जो व्यक्ति मृत्यु के समय ओम् का जप करते हुए भगवान का स्मरण करता है, वह परम गति को प्राप्त करता है।”
यह केवल मृत्यु का संदेश नहीं, बल्कि जीवन का दिशा-सूत्र है —
क्योंकि जो जीवनभर ओम् का ध्यान करता है, वही अंत में भगवान को स्मरण कर सकता है।
इसलिए साधक को चाहिए कि वह नित्य ओम् का जप, ईश्वर का नाम-स्मरण, और मन की शुद्धि का अभ्यास करे —
ताकि मृत्यु का क्षण भी ब्रह्म से मिलन का क्षण बन जाए।
“ओम्” — यह एकाक्षर ब्रह्म — जीवन, मृत्यु और मुक्ति तीनों का रहस्य है।

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