Bhagavad Gita: Hindi, Chapter 9, Sloke 08

मूल श्लोक – 8

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः |
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || 8 ||

शब्दार्थ

संस्कृत शब्दहिन्दी अर्थ
प्रकृतिम्प्रकृति
स्वाम्अपनी
अवष्टभ्यअधीन कर, नियंत्रित करके
विसृजामिरचता हूँ, उत्पन्न करता हूँ
पुनः पुनःबार-बार
भूतग्रामम्प्राणियों का समूह
इमम्इस
कृत्स्नम्सम्पूर्ण
अवशम्विवश, असहाय
प्रकृतेःप्रकृति के
वशात्अधीन

प्राकृत शक्ति का अध्यक्ष होने के कारण मैं बारम्बार असंख्य योनियों के जीवों को उनकी प्रकृति के अनुसार पुनः-पुनः उत्पन्न करता हूँ।

विस्तृत भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण सृष्टि-चक्र के रहस्य को स्पष्ट करते हैं।
वे बताते हैं कि सृष्टि कोई एक बार की घटना नहीं,
बल्कि निरंतर होने वाली प्रक्रिया है।

“पुनः पुनः” —
यह शब्द संकेत देता है कि —

  • सृष्टि होती है
  • सृष्टि लीन होती है
  • और फिर सृष्टि होती है

भगवान कहते हैं कि —

मैं स्वयं सृष्टि करता हूँ,
पर जीव अपनी प्रकृति के गुणों के कारण
उसमें विवश होकर बंध जाता है।

ईश्वर कर्त्ता है,
पर जीव भोगकर्ता और बंधनग्रस्त बन जाता है।

दार्शनिक दृष्टिकोण

यह श्लोक ईश्वर, प्रकृति और जीव के संबंध को त्रिकोण रूप में प्रस्तुत करता है।

  • ईश्वर — नियंत्रक
  • प्रकृति — साधन
  • जीव — गुणों से बंधा हुआ

दार्शनिक रूप से यह बताया गया है कि —

जीव अपने कर्मों का स्वामी नहीं,
बल्कि अपनी प्रकृति का दास बन जाता है।

जब तक जीव त्रिगुणात्मक प्रकृति के अधीन है,
वह जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है।

प्रतीकात्मक अर्थ

श्लोकांशप्रतीकात्मक अर्थ
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्यईश्वर प्रकृति को नियंत्रित करता है
विसृजामि पुनः पुनःसृष्टि चक्र निरंतर चलता है
भूतग्राममिमं कृत्स्नम्सम्पूर्ण जीव जगत
अवशं प्रकृतेर्वशात्जीव गुणों के वश में बंधा है

आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा

  • सृष्टि ईश्वर की इच्छा से होती है, संयोग से नहीं
  • जीव अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करता है
  • अहंकार का त्याग आवश्यक है — “मैं ही कर्ता हूँ” यह भ्रम है
  • प्रकृति से ऊपर उठना ही मुक्ति का मार्ग है
  • ईश्वर की शरण ही त्रिगुणों से मुक्ति दिलाती है

आत्मचिंतन के प्रश्न

  • क्या मैं अपने कर्मों का पूर्ण कर्ता स्वयं को मानता हूँ?
  • क्या मैं अपनी प्रकृति और गुणों को पहचान पा रहा हूँ?
  • क्या मैं प्रकृति के अधीन हूँ या ईश्वर की शरण में?
  • क्या मेरे कर्म मुझे बंधन में डाल रहे हैं या मुक्त कर रहे हैं?
  • क्या मैं पुनः-पुनः जन्म के चक्र से निकलने का प्रयास कर रहा हूँ?

निष्कर्ष

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि —

ईश्वर सृष्टि करता है,
जीव उसमें बंध जाता है।

जब तक जीव अपनी प्रकृति के वश में है,
तब तक वह विवश है।

पर जब वही जीव ईश्वर की शरण ग्रहण करता है,
तब वह प्रकृति से ऊपर उठकर
मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

राजगुह्य ज्ञान का यही संदेश है —
बंधन का कारण प्रकृति है,
और मुक्ति का मार्ग परमात्मा की शरण।

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