मूल श्लोक: 27
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् |
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ||
शब्दार्थ
- यत् करोषि — जो भी कर्म तुम करते हो
- यद् अश्नासि — जो भी भोजन तुम ग्रहण करते हो
- यत् जुहोषि — जो भी यज्ञ तुम अर्पित करते हो
- ददासि — जो भी दान या सेवा तुम देते हो
- यत् तपस्यसि — जो भी तप और साधना करते हो
- कौन्तेय — हे अर्जुन, पुत्र कुन्ती
- तत् कुरुष्व — वही करो
- मदर्पणम् — सब कुछ मुझमें (भगवान में) अर्पित करो
हे कुन्ती पुत्र! तुम जो भी करते हो, जो भी खाते हो, पवित्र यज्ञाग्नि में जो आहुति डालते हो, जो भी दान देते हो, जो भी तपस्या करते हो, यह सब मुझे अर्पित करते हुए करो।

विस्तृत भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति और कर्म के सर्वोच्च सूत्र को स्पष्ट करते हैं।
- सभी कर्मों का समर्पण —
- चाहे वह शारीरिक कार्य हों,
- चाहे भोजन ग्रहण करना या यज्ञ करना हो,
- चाहे दान देना या तप करना हो।
- एक लक्ष्य — सब कुछ भगवान में अर्पित करना।
- सत्य साधक वही है जो केवल कर्म नहीं करता,
बल्कि हर कर्म में ईश्वर को समर्पण भाव रखता है। - यह श्लोक कर्मयोग और भक्ति योग का संगम है।
- कर्म और भक्ति दोनों अलग नहीं,
- कर्म में भक्ति और भक्ति में कर्म आवश्यक हैं।
भावात्मक व्याख्या और गहराई से विश्लेषण
दार्शनिक दृष्टिकोण
- श्लोक स्पष्ट करता है कि साधक का लक्ष्य केवल ईश्वर-सम्मुख होना है,
न कि केवल परिणाम प्राप्त करना। - सभी कर्म ईश्वर में अर्पित करने योग्य हैं,
जिससे मन असक्त और जीवन मोक्ष-सम्पन्न होता है। - यह सर्वकर्म संन्यास का मार्ग है —
न कर्म का परित्याग, बल्कि कर्म में ईश्वर की भक्ति।
प्रतीकात्मक अर्थ
| श्लोकांश | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|
| यत्करोषि | सभी कर्म, कार्य और जिम्मेदारियाँ |
| यदश्नासि | ग्रहण किया गया भोजन, भौतिक आवश्यकताएँ |
| यज्जुहोषि | यज्ञ और पूजा |
| ददासि | दान और सेवा, परोपकार |
| यत्तपस्यसि | तप, साधना और आत्मसंयम |
| तत्कुरुष्व | इसे करो, और ईश्वर में अर्पित करो |
| मदर्पणम् | सब कुछ ईश्वर को समर्पित करने का भाव |
आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा
- जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य — हर कर्म में ईश्वर का ध्यान और समर्पण।
- साधक का मन फल की चिंता से मुक्त होता है।
- यह श्लोक कर्म, भक्ति और ज्ञान का सम्मिलन है।
- साधक चाहे कोई भी कार्य करे, अगर वह मुझे समर्पित करता है,
तो वह कर्म उसे अशुभ बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है।
आत्मचिंतन के प्रश्न
- क्या मैं अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करता हूँ?
- क्या मैं अपने भोजन, कार्य, यज्ञ, दान और साधना में भक्ति भाव रखता हूँ?
- क्या मेरा मन कर्मफल में फँसा है या ईश्वर-सम्मुख है?
- क्या मैं इस भाव से जीवन जी सकता हूँ कि सब कुछ भगवान के लिए है?
निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में स्पष्ट करते हैं कि —
सच्चा योग और भक्ति यही है कि जीवन के सभी कर्म, भोग, तप, यज्ञ और सेवा को ईश्वर में अर्पित कर दो।
यह श्लोक कर्मयोग का सार है — कर्म में संन्यास नहीं,
बल्कि असक्ति और भक्ति से कर्म का समर्पण।
अतः साधक को चाहिए कि वह —
- अपने हर कर्म में ईश्वर की उपस्थिती अनुभव करे
- और फल की चिंता छोड़कर समर्पण भाव से कार्य करे 🌸
